मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, April 18, 2011

पेश हैं --कुछ कतए..डा श्याम गुप्त...

१- न समझे...

लाख  हमने कहा,   तुम न समझे,
इशारे  हमारे भी,   तुम न समझे |
अब  न  कभी  भी,   आवाज़  देंगे --
जो अब नसमझे,खुदा तुम से समझे ||

२--कदमों के निशाँ ---

हम राह के काँटों को  बुहारते चलेगये ,
गो की ज़िंदगी अपनी संवारते चले गए |
इस राह पे तू गुज़रा होगा ज़रूर  -
तेरे कदमों के निशाँ निहारते चले गए ||

३-रोशनी का मंज़र  ...

दिखाके हमें,  रोशनी का मंज़र,
कितने अंधेरों की राह दिखा दी तुमने |
डूब ही जायेंगे,  अँधेरे के समंदर में ,
हाथ को हाथ,  जो न दिया तुमने ||

४-जीना भी क्या है...

ज़िंदगी के पास आखिर और क्या है,
मौत के ही सिवा आखिर रखा क्या है |
क्यों न जोशो-जुनूँ से उसको जियें,
हँसने-जीने के बिना जीना भी क्या है ||

6 comments:

krati said...

bahut khoob.

shanno said...

हर नज्म बहुत खूबसूरत है :)

DR. ANWER JAMAL said...

Nice Qata'at.

शालिनी कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

DR. ANWER JAMAL said...

@ Shalini ji ! मुझे उम्मीद थी कि कोई न कोई अक्लमंद इस जुमले का ऐसे ही इस्तेमाल करेगा .
आपने ब्लॉग पर मौजूद इस सुविधा से अच्छा फायदा उठाया है.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद सभी हज़रात का..