मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, April 17, 2011

"नग्नता सूरत दिखाने आ गईं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पड़ गईं जब पेट में दो रोटियाँ, 
बेजुबानों में जुबानें आ गईं। 

बस गईं जब बीहड़ों में बस्तियाँ, 
चल के शहरों से दुकानें आ गईं। 

मन्दिरों में आरती होने लगीं, 
मस्जिदों में भी नमाजें आ गईं। 

कंकरीटों की फसल उगने लगी, 
नस्ल नूतन कहर ढाने आ गई। 

गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे, 
नग्नता सूरत दिखाने आ गईं। 

10 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (18-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Kunal Verma said...

बहुत ही खूबसूरत रचना।आभार

एक बार जाएँ: http://shabdshringaar.blogspot.com

डा. श्याम गुप्त said...

सुन्दर व सार्थक रचना....

DR. ANWER JAMAL said...

बिल्कुल सही ख़ाका उकेरा है आपने।
शुक्रिया।

शालिनी कौशिक said...

गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे,
नग्नता सूरत दिखाने आ गईं

बिल्कुल सही ख़ाका उकेरा है आपने।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत कुछ कहती खूबसूरत गज़ल

सुशील बाकलीवाल said...

यथार्थ की तस्वीर दिखाती बहुत सुन्दर रचना ।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

कंकरीटों की फसल उगने लगी,
नस्ल नूतन कहर ढाने आ गई।

गगनचुम्बी शैल हिम तजने लगे,
नग्नता सूरत दिखाने आ गईं।


वर्तमान दशा और दिशा का धारदार चित्रण..बधाई.

Anita said...

गजल का हर शेर अपने आप में मुकम्मल है, बेहद प्रभावशाली कथ्य !

monali said...

Beautiful post :)