मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 16, 2011

मीना कुमारी जी की शायरी -आपके लिए

शमा हूँ ,फूल हूँ,
या रात पे क़दमों के निशां,
आपको हक है मुझे जो चाहे कह लें.

जिन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा और जान तन्हा,
चाँद तन्हा है आसमान तन्हा,
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा.

टुकड़े टुकड़े दिन बीता
धज्जी धज्जी रात मिली,
जिसका जितना आँचल था
उतनी ही सौगात मिली .

साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब,
दिल ही दुखता है      ना  अब आस के दर होती है,
जैसी जागी हुई आँखों में चुभें कांच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है.

गम ही दुश्मन है मेरा
गम को ही दिल ढूंढता है,
इक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है.


      प्रस्तुति-शालिनी कौशिक

5 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

टुकड़े टुकड़े दिन बीता
धज्जी धज्जी रात मिली,
जिसका जितना आँचल था
उतनी ही सौगात मिली
वाह! बहुत खूब .

वन्दना said...

बहुत सुन्दर

अफसर पठान (afsarpathan) said...

kya khoob
tareef ke kabil
zandar

shukriya
thnx

Kunwar Kusumesh said...

मीना जी फ़िल्मी दुनिया की जितनी खूबसूरत अदाकारा थीं उतनी अच्छी शाइरा भी थीं. उन्हें पढ़ना अच्छा लगा.

डा. श्याम गुप्त said...

वह तो सुन्दर है ही जी...