मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, April 25, 2011

तटबंध होना चाहिये.....डा श्याम गुप्त...



        तटबंध होना चाहिये.........

साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चहिये ।
साहित्य शुचि शुभ ग्यान पारावार होना चाहिये ।

समाचारों के लिये अखबार छपते रोज़ ही,
साहित्य में सरोकार-समाधान होना चाहिये।

आज हम उतरे हैं इस सागर में कहने को यही,
साहित्य हो या कोई सागर गहन होना चाहिये ।

डूब कर उतरा सके जन जन व मन-मानस जहां,   
भाव सार्थक, अर्थ भी ऋजु -पुष्ट होना चाहिये।

चित्त भी हर्षित रहे, नव-प्रगति भाव रहें यथा,
कला सौन्दर्य भी सुरुचि शुचि सुष्ठु होना चाहिये।

क्लिष्ट शब्दों से सजी, दूरस्थ भाव न अर्थ हों,
कूट भाव न होंसुलभ संप्रेष्य होना चाहिये ।

ललित भाषा, ललित कथ्य, न सत्य-तथ्य परे रहे,
व्याकरण, शुचि-शुद्ध, सौख्य-समर्थ होना चाहिये ।

श्याम , मतलब सिर्फ़ होना शुद्धतावादी नहीं,
बहती दरिया रहे, पर तटबंध होना चाहिये ॥

---२५-४-११.. 05.47 PM

2 comments:

shanno said...

वाह ! श्याम जी बहुत बढ़िया...खूब कहा..''तटबंध होना चाहिये''

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शन्नो जी...

विश्व में वह कौन सीमा हीन है
हो न जिसका खोज सीमा में बंधा ।