मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 15, 2011

"छाया घना अन्धेरा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


♥ ग़ज़ल ♥  

सियाह रात है, छाया घना अन्धेरा है
अभी तो दूर तलक भी नहीं सवेरा है

अभी तो तुमसे बहुत दिल के राज़ कहने हैं
अभी फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है

हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है

अभी न जाओ खतरनाक सूनी राहों पे
कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है

7 comments:

वन्दना said...

वाह वाह्…………गज़ल ने दिल छू लिया…………शानदार प्रस्तुति।

DR. ANWER JAMAL said...

छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है

वाह वाह् !!!

shanno said...

बहुत खूब...बहुत उम्दा गजल !

शालिनी कौशिक said...

हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है


बहुत खूब

Kunwar Kusumesh said...

वर्तमान हालातों का बखूबी चित्रण दिखता है इसमें.
बहुत खूब.

Dilbag Virk said...

bhav to lazvab ,par bahr ke bare men kya kahoon ,aap gyani gyan hain

prem said...

आपके गीतों का आनन्द तो था ही. ये ग़जल की खुश्बू भी अछ्छी है.