मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, April 19, 2011

चंद लघु गज़लें..डा श्याम गुप्त...

 अब महफ़िले शम्मा मेरे सम्मुख है तो पेश करता हूं, गौर फ़र्माइये....चंद  गज़लें .....

१---
नेकियां यूंही करते रहो ।
ज़िन्दगी यूंहीं जीते रहो ।

कंकड पूजो पत्थर पूजो,
बस प्रभु का नाम लेते रहो।


काबा जाओ काशी जाओ,
प्रेम का प्याला पीते रहो ।

खुदा कहो, ईश्वर, रब यारो,
जीने दो श्याम’जीते रहो ॥



२-
तुम्हारे साथ जीना, क्या कहना 
हर लम्हा जीना, क्या कहना ।

बून्द बून्द हर सांस सांस की,
घूंट घूंट पीना, क्या कहना ।

नज़्म हो कतआ या कि गज़ल हो,
मुस्काये  हंसीना, क्या कहना ।

वो मस्त हवायें,  हवा हुईं,
अब श्याम न कहना, क्या कहना ॥


5 comments:

Kunal Verma said...

बहुत खूब। आभार

DR. ANWER JAMAL said...

बहुत खूब, डाक्टर साहब , जवाब नहीं आपकी फ़नकारी का !
आप तो रूस्तम निकले , इतना अच्छा कलाम अभी तक कौन सी तिजोरी में बंद कर रखा था आपने ?

शालिनी कौशिक said...

कंकड पूजो पत्थर पूजो,
बस प्रभु का नाम लेते रहो।




काबा जाओ काशी जाओ,
प्रेम का प्याला पीते रहो ।


खुदा कहो, ईश्वर, रब यारो,
जीने दो श्याम’जीते रहो ॥
bahut khoob,badhai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचनाएँ!
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सभी सहयोगी रचनाधर्मियों से निवेदन है कि अपनी रचनाएँ किसी अन्य साथी की रचना प्रकाशित होने के कम से कम 8 घंटे पश्चात ही पोस्ट किया करें तो अच्छा रहेगा। अन्यथा रचना आपकी डायरी में पड़ी रहे या ब्लॉग पर इससे कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।
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हमारा उद्देश्य तो यह होना चाहिए कि कि लोग हम सबकी रचनाओं को पढ़ें। जिससे कि डॉ. अनवर जमाल की मुशायरे की लौ हमेशा जलती रहे।
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शुभकामनाओं सहित।

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय शास्त्री जी ! आपकी रचना पूरी पढ़ी और सुनी आधी . हमारी छोटी बेटी ने हैडफ़ोन छीन लिया है . जितना पढ़ा और सुना , अच्छा लगा और अभी हमने अपनी बेटी से पूछा कि आपको गीत कैसा लगा तो वह बोली 'अच्छा'.
इससे ज्यादा वह बोल नहीं पाती, अभी सिर्फ तीन साल की है .
आपने बहुत ही अच्छी रचना प्रस्तुत की है. अपने घर और वतन की मुहब्बत आदमी की फितरत और स्वभाव का हिस्सा है.
आपने फितरी जज़्बात को बहुत अछे अलफ़ाज़ का जामा पहनाया है .
शुक्रिया .
"मेरे प्यारे वतन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अब मुशायरे में निमंत्रित लोग खासी तादाद में आ चुके हैं , लिहाज़ा आपको इस साल के लिए आपको इस महफ़िल ए मुशायरा का 'सद्र' (अध्यक्ष) मुन्तखब किया जाता है .
तमाम शो'रा ए किराम और सम्माननीय कवियों से गुजारिश है कि वे सद्र मोहतरम के उसूल ओ जज़्बात का ख़याल रखें .
यह एक अदबी महफ़िल है और यहाँ अदब को तरजीह ज़रूर दी जानी चाहिए .
जनाब शास्त्री जी से दरख्वास्त है कि वे मंसब ए सदारत कुबूल फरमाएं .
शुक्रिया .
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इसी के साथ मैं यह कहना चाहूँगा कि मैं खुद भी इस उसूल कि पाबंदी करूँगा कि किसी रचना के ब्लॉग पर आने के ८ घंटे बाद ही कुछ लिखूं लेकिन मैं अपना यह हक़ माफ़ करता हूँ क्योंकि मैं खुद को आप जैसे रचनाकारों की रचनाएं पढने से ८ घंटे तक नहीं रोक सकता लिहाज़ा मेरे बाद जो कोई भी जितनी जल्दी पोस्ट मुझे पढ़ने को मुहैया कराएगा , मुझे उतनी ही ज्यादा खुशी होगी.
मुशायरा अनवर जमाल ने जमाया ज़रूर है लेकिन इसकी लौ तो आप सभी के दम से रौशन है इसका उजाला तो सारे हिंदी ब्लॉगजगत को रौशन करेगा ही , इंशा अल्लाह . आमीन .
बाक़ी बातें इस विषय में एक पोस्ट के रूप में सामने रखूँगा , शाम को .