मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, December 28, 2011

दल उभरता नहीं, संगठन के बिना


स्वर सँवरता नहीं, आचमन के बिना।
पग ठहरता नहीं, आगमन के बिना।।

देश-दुनिया की चिन्ता, किसी को नहीं,
मन सुधरता नहीं, अंजुमन के बिना।

मोह माया तो, दुनिया का दस्तूर है,
सुख पसरता नहीं, संगमन के बिना।

खोखली देह में, प्राण कैसे पले,
बल निखरता नहीं, संयमन के बिना।

क्या करेगा यहाँ, अब अकेला चना,
दल उभरता नहीं, संगठन के बिना।

“रूप” कैसे खिले, धूप कैसे मिले?
रवि ठहरता नहीं है, गगन के बिना।

Tuesday, December 27, 2011

ये औरत ही है !


ये औरत ही है !


पाल कर कोख में जो जन्म देकर बनती है जननी

औलाद की खातिर मौत से भी खेल जाती है .


बना न ले कहीं अपना वजूद औरत

कायदों की कस दी नकेल जाती है .


मजबूत दरख्त बनने नहीं देते

इसीलिए कोमल सी एक बेल बन रह जाती है .


हक़ की आवाज जब भी बुलंद करती है

नरक की आग में धकेल दी जाती है




फिर भी सितम सहकर वो मुस्कुराती है

ये औरत ही है जो हर ज़लालत झेल जाती है .


शिखा कौशिक

[vikhyaat ]












Tuesday, December 20, 2011

मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए

Farhat Durrani

जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

...
लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।

जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।


--कन्हैयालाल नंदन

Wednesday, December 14, 2011

शब भर रह़ा चर्चा तेरा

  • कल चौदहवीं की रात थी,
    शब भर रह़ा चर्चा तेरा |
    किसी ने कहा कि चाँद है,
    किसी ने कहा चेहरा तेरा |
    हम भ़ी वहीं मौजूद थे,
    ... हम से भ़ी सब पूछा किए |
    हम कुछ न बोले चुप रहे,
    मंज़ूर था परदा तेरा |

Saturday, December 10, 2011

आओ चुप्पी तोड़कर इन सबका भांडा फोड़ दें

न्याय की गद्दी पर बैठे व् न्याय दिलवाने वाले ही भ्रष्ट हो जायेंगे तो समाज को अपराध -अन्याय के गहरे गर्त में जाने से कौन रोक सकता है ?आज यह जरूरी हो गया है जनता सजग बने .अन्याय का विरोध करे -

जो कलम रिश्वत की स्याही से लिखे इंसाफ को
मुन्सिफों की उस कलम को आओ आज तोड़ दें .

जो लुटे इंसाफ की चौखट पे माथा टेककर;
टूटे हुए उनके भरोसे के सिरों को जोड़ दें .

कितने में बिकते गवाह; कितने में मुंसिफ बिक रहे
आओ चुप्पी तोड़कर इन सबका भांडा फोड़ दें .

इंसाफ की गद्दी पे बैठे हैं , इसे ही बेचते
सोयी हैं जिनकी रूहें आओ उन्हें झंकझोर दें .

जो जिरह के नाम पर लोगों की इज्जत तारते
ए शिखा !उनसे कहो कि वे वकालत छोड़ दें .

Tuesday, November 29, 2011

"प्यारी-प्यारी बातें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


बात-बात में हो जाती हैं, देखो कितनी सारी बातें।
घर-परिवार, देश-दुनिया की, होतीं सबसे न्यारी बातें।।

रातों में देखे सपनों की, दिन भर की दिनचर्या की भी,
सुबह-शाम उपवन में जाकर, होतीं प्यारी-प्यारी बातें।

बातों का नहीं ठौर-ठिकाना, बातों से रंगीन जमाना,
गली-गाँव चौराहे करते, मेरी और तुम्हारी बातें।

बातें ही तो मीत बनातीं, बातें बैर-भाव फैलातीं,
बातों से नहीं मन भरता है, सुख-दुख की संचारी बातें।

जाल-जगत के ढंग निराले, हैं उन्मुक्त यहाँ मतवाले,
ज्यादातर करते रहते हैं, गन्दी भ्रष्टाचारी बातें।

लेकिन कोश नहीं है खाली, सुरभित इसमें है हरियाली,
सींच रहा साहित्य सरोवर, उपजाता गुणकारी बातें।

खोल सको तो खोलो गठरी, जिसमें बँधी ज्ञान की खिचड़ी,
सभी विधाएँ यहाँ मिलेंगी, होंगी विस्मयकारी बातें।

नहीं “रूप” है, नहीं रंग है, फिर भी बातों की उमंग है,
कभी-कभी हैं हलकी-फुलकी, कभी-कभी हैं भारी बातें। 

Thursday, November 17, 2011

...काश मैं सब के बराबर होता

इस बलन्दी पे बहुत तन्हा हूँ,
काश मैं सब के बराबर होता |
उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे,
वरना एक और कलंदर होता ||

Sunday, November 13, 2011

जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं


जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं,
अब तो बस आसमान बाकी है |
सर क़लम होंगे कल यहाँ उनके,
जिनके मुंह में ज़बान बाक़ी है ||
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/11/blog-post_7018.html

Thursday, November 10, 2011

मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा ,
कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा |
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला ,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा |
-(अज्ञात)

Monday, October 24, 2011

"ज़िन्दगी धूप और छाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


दोस्त बनके हमें रुलाया है
बेसबब उसने सितम ढाया है

भूल कर प्यार-वफा की बातें
उसने दिल को बहुत दुखाया है

ज़िन्दगी के हसीन लम्हों को
उसने पल भर में ही भुलाया है

साथ उसके जो घोंसला था बुना
आँधियों ने उसे गिराया है

उसको दिन का न उजाला भाया
नग़मगी ख़्वाब पसन्द आया है

आज मेरी है कल पराई है
आती-जाती हुई ये माया है

जिसने काँटों की चुभन झेली है
उसने फूलों का नाम पाया है

“रूप”-यौवन अधिक नहीं टिकता
ज़िन्दगी धूप और छाया है

ग़म इतना खा जाने के बाद

अब तुम्हीं से क्या छुपाएं, सब बता जाने के बाद।
हम कहाँ भूखे रहे, ग़म इतना खा जाने के बाद।।
-ग़ाफिल
Bloggers' Meet Weekly 14 का लिंक  
http://hbfint.blogspot.com/2011/10/bloggers-meet-weekly-14-character.html

Thursday, October 20, 2011

दरिया दिली अच्छी लगी

दर्द पर भी प्यार आया, चोट भी अच्छी लगी |
आज पहली बार मुझको, ज़िन्दगी अच्छी लगी ||
दर्द बख्शा गम दिया, आंसू इनायत कर दिए |
मेरे मोहसिन ये तेरी, दरिया दिली अच्छी लगी ||
(साभार अज्ञात शायर)

"निरंतर" की कलम से.....: सारे मौसम देख लिए

"निरंतर" की कलम से.....: सारे मौसम देख लिए: सारे मौसम देख लिए अब किस मौसम का इंतज़ार करूँ बहारों को खिजा में बदलते देखा महकते फूलों को मुरझाते देखा अरमानों को निरंतर टूटते देखा हसरते...

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी: इस बार तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी तुम्हारी निगाहें फर्क थी तुमसे मिल कर कुछ मुझे भी होने लगा जहन में खुशनुमा अहसास हुआ दिल का धडकन...

Sunday, October 16, 2011

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया: ज़ख्म खाना रोज़ का काम हो गया भरी दोपहर अन्धेरा छा गया रात दिन में फर्क करना मुश्किल हो गया सहना आदत में शुमार हो गया सब्र अब मर...

"निरंतर" की कलम से.....: माना की तुमने जिद ठान ली

"निरंतर" की कलम से.....: माना की तुमने जिद ठान ली: माना की तुमने जिद ठान ली हाँ नहीं भरने की कसम खा ली मेरी दुआओं की तासीर भी कम नहीं बड़ी शिद्दत से खुदा से माँगी है निरंतर ईमान स...

Monday, October 10, 2011

" इतना नहीं ख़फा होते" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


ज़रा सी बात पे इतना नहीं ख़फा होते
हमेशा बात से मसले रफा-दफा होते

इबादतों के बिना तो खुदा नहीं मिलता
बिना रसूख के कोई सखा नहीं होते

जो दूसरों के घरों पर उछालते पत्थर
कभी भी उनके सलामत मकां नहीं होते

फ़लक के साथ जमीं पर भी ध्यान देते तो
वफा की राह में काँटे न बेवफा होते

अगर न “रूप” दिखाते डरावना अपना
तो दौरे-इश्क में दोनों ही बावफा होते

Tuesday, October 4, 2011

फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया


ज़ुबां  से कहूं तो है तौहीन उनकी
वो ख़ुद जानते हैं मैं क्या चाहता हूं
-अफ़ज़ल मंगलौरी

जब से छुआ है तुझको महकने लगा बदन
फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया
-अलीम वाजिद

ये कुछ अशआर हैं जिन्हें गाज़ियाबाद के मुशायरे में पढा गया।
यह मुशायरा २ अक्तूबर के मौके पर 'अदबी संगम' की जानिब से कराया गया।

Sunday, October 2, 2011

तीसरा बच्चा किया तो होगी जेल ?

तीसरा बच्चा करने पर अब जेल होगी ?...खुशदीप

हा हा हा ...

तीसरा बच्चा किया तो होगी जेल
ट्रांसफर होगा छोटी से बड़ी जेल

जेल से डरता कौन पति है
पत्नी जेलर चलाए घर की जेल

मुक्ति का समय सुहाना आया रे
अब बना दो जमकर बीवी की रेल

अकल ठिकाने लगा दो उनकी
जिन्होंने बखशी तुम्हें घर की जेल

Thursday, September 29, 2011

" सबको प्यारा लगता है" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



सुखद बिछौना सबको प्यारा लगता है
यह तो दुनिया भर से न्यारा लगता है

जब पूनम का चाँद झाँकता है नभ से
उपवन का कोना उजियारा लगता है

सुमनों की मुस्कान भुला देती दुखड़े
खिलता गुलशन बहुत दुलारा लगता है

जब मन पर विपदाओं की बदली छाती
तब सारा जग ही दुखियारा लगता है

देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
उनको तो मझधार किनारा लगता है

बातों से जनता का पेट नहीं भरता
सुनने में ही प्यारा नारा लगता है

दूर-दूर से “रूप” पर्वतों का भाता
बाशिन्दों को कठिन गुजारा लगता है

Wednesday, September 28, 2011

एक कतआ ....ड़ा श्याम गुप्त....

गौरैया हमारे दर
वो आये हमारे दर इनायत हुई ज़नाब |
आये  बाद बरसों  आये  तो  ज़नाब |
इस मौसमे-बेहाल में बेहाल आप हैं -
मुश्किल से मयस्सर हुए दीदार ऐ ज़नाब ||

आये बाद बरसों

Monday, September 26, 2011

वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि

लिखें हम सही लाख मगर मुसलमां
समझके वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

यह हमने मंसूर अली हाशमी साहब की ग़ज़ल पढ़कर कहा है .
उनकी ग़ज़ल यह है .

Blogging at any cost !


लिखना ज़रूरी है !




लिखो कुछ भी; वो पढ़ने आयेंगे ही,

भले दो शब्द ; पर टिप्याएंगे ही.

समझ में उनके आये या न आये,
प्रशंसा करके वो  भर्माएंगे ही. 

जो दे गाली, तो समझो प्यार में है!
कभी इस तरह भी तड़पाएंगे ही.

न जाओ उनकी 'साईट' पर कभी तो,
बिला वजह भी वो घबराएंगे ही.

कभी 'यूँही' जो लिखदी बात कोई ! 
तो धोकर हाथ पीछे पड़जाएंगे ही.

बहुत गहराई है इस 'झील' में तो,
जो उतरे वो तो न 'तर' पाएंगे ही. 

ये बे-मतलब सा क्या तुम हांकते हो!
न समझे है न हम समझाएंगे ही !!

लगा है उनको कुछ एसा ही चस्का,  
कहो कुछ भी वो सुनने आयेंगे ही.
http://mansooralihashmi.blogspot.com/2011/09/blogging-at-any-cost.html?showComment=1317042716126#c4083872711169427504

आज़ाद फिलिस्तीन की संभावना कितनी है ?


एक शायर असद रज़ा के शब्दों में

सहयूनी तशददुद ओ मज़ालिम की वजह से
हालात अगरचे हैं वहां पर बड़े संगीन
ये अज्म से 'अब्बास' के होने लगा है ज़ाहिर
अब जल्द ही हो जाएगा आज़ाद फिलिस्तीन


सहयूनी तशददुद - यहूदियों की हिंसा , मज़ालिम - जुल्म का बहुवचन,


आज सोमवार है और यह दिन हिंदी ब्लॉग जगत में 'ब्लॉगर्स मीट वीकली' के लिए जाना जाता है। जो लोग नए नए ब्लॉगर बने हैं वे इस मीट के जरिये पुराने और अनुभवी ब्लॉगर्स के संपर्क में आते हैं और उनकी पोस्ट्‌स को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। सीखने वाली बातों में सबसे बड़ी बात सभ्यता और शालीनता है। ब्लॉगर होने का मतलब यह तो नहीं है कि बदतमीज़ी की जाए या जो चाहो वह कह दो, जिसे चाहो उसे कह दो।
आलोचना का तरीक़ा भी सभ्य होना चाहिए और यह भी देख लेना चाहिए कि शब्द भी सभ्य हों।
साथ रहना है तो सम्मान देना ही पड़ेगा ।
अभद्र लोग खुद रिश्तों को तोड़ते चले जाते हैं।
ब्लॉगिंग का इस्तेमाल जुड़ने  के लिए होना चाहिए।
इन पंक्तियों पर हम सब को गौर करना चाहिए।

Sunday, September 25, 2011

" हो गये उनके हम वो हमारे हुए" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


उनके आने से दिलकश नज़ारे हुए
मिल गई जब नज़र तो इशारे हुए

आँखों-आँखों में बातें सभी हो गईं
हो गये उनके हम वो हमारे हुए

रस्मों-दस्तूर की बेड़ियाँ तोड़कर
अब तो उन्मुक्त पानी के धारे हुए

सारी कलियों को खिलना मयस्सर नहीं
सूख जातीं बहुत मन को मारे हुए

कितने खुदगर्ज़ आये-मिले चल दिये
मतलबी यार सारे के सारे हुए

जो दिलों की हैं धड़कन को पहचानते
बेसहारों के वो ही सहारे हुए

“रूप”-रस का है लोभी जमाना बहुत
चूस मकरन्द भँवरे किनारे हुए

Saturday, September 24, 2011

एक नज़्म....ड़ा श्याम गुप्त.....

मैंने उस वक्त को इस दिल में सजा रखा है |
तेरी  तस्वीर को  बटुए में  छुपा रखा  है |

मेरे संग है अभी भी तू  इन ज़वाँ यादों में ,
खुद को घिरा रखा है वक्त के हमसायों में |

ख्यालों में अब भी जवाँ धडकनों की बातें हैं,
वक्त  को तेरे लिए बंदी  बना के रखा  है |

वही सूरत बसी है  अब भी  दिले-नादाँ में,
ठहरा है वक्त दिल की हर धडकने-अदा में |

माना कि इक ज़माना हुआ तुमसे जुदा हुए,
मन का आईना है तेरा वही अक्स लिए |

तुम न आये लौट कर, तो आना भी नहीं अब,
ऐसा न हो मन का जवाँ दर्पण चटख जाए |

मेरे महबूब जो तू अब अगर मिल जायगा ,
वक्त मुट्ठी से मेरे शायद फिसल जायगा ||

Thursday, September 22, 2011

ये इश्क़ जगाता क्यों है ?


पूछा है तो सुनो,
अब सो जाओ
लेकिन थकना मस्ट है पहले
थकने के लिए
चाहो तो जागो
चाहो तो भागो

कौन किसे छोड़ता है
जिसे देखो यहां वो नोचता है
हरेक दूसरे को निचोड़ता है
कोई कोई तो भंभोड़ता है
ख़ुशनसीब है वो जो तन्हा है
कि महफूज़  है मुकम्मल वो

सरे ज़माना आशिक़  मिलते कहां हैं ?
हॉर्मोन में उबाल प्यार तो नहीं
पानी बहा देना प्यार तो नहीं
क़तरा जहां से भी टपके
आख़िर भिगोता क्यों है
ये इश्क़ मुआ जगाता क्यों है ?

ये पंक्तियां डा. मृदुला हर्षवर्धन जी के इस सवाल के जवाब में

Wednesday, September 21, 2011

गीत ..हे मन...ड़ा श्याम गुप्त .....

                       मुशायरे की रफ़्तार  कुछ धीमी होचली है ...पता नहीं क्यों  ! ....खैर ..लीजिए .मैं ही अपनी पेशकश रखता हूँ.........मन की ही तो बात है.... होसकता है कि शायरों- कवियों का मन कुछ पेश करने को नहीं बन पा रहा हो ....इसी मन ...पर पेश है एक गीत ....................

हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||

प्रेम की शिक्षा प्रीति की इच्छा,
तुम्हीं प्रेम  व्यापार |
तुम मानस, उर, चित, जिय, हियरा ,
तुम्हीं स्वप्न संसार |
तुमसे बनें भावना सारी ,
तुम्हीं प्रेम साकार |         
        हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
रूप  रंग  रस  भाव कार्य सब-
क्रिया-कलाप व्यवहार |
इक दूजे के मन को भाते ,
कर लेते अधिकार |
तन मन परवश होजाता तब-
तुम बन जाते प्यार |      
           हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
विह्वल भाव होजाते हो मन ,
बन आंसू आधार |
अंतर्मन में बस बन जाते ,
स्वप्नों का संसार |
श्याम का तन-मन स्मृति-वन हो -
उमड़े प्रेम अपार |
             हे  मन ! प्रेम के तुम आधार ||

Tuesday, September 20, 2011

...कृष्ण लीला......ड़ा श्याम गुप्त....

           (   दो  कुण्डलियाँ .)
सोलह हज़ार नारियाँ , परित्यक्ता गुमनाम |
निज रानी सम श्याम ने, उन्हें दिलाया मान |
उन्हें दिलाया मान, नयी जग रीति सजाई |
नहीं किसी की ओर ,कभी पर आँख उठायी |
जग में प्रथम प्रयास यह, नारी का उद्धार |
भ्रमवश कहते रानियाँ , थीं सोलहों  हज़ार ||

रीति निभाई जगत की, जो पटरानी आठ |
अन्य किसी के साथ कब श्याम निभाए ठाठ |
श्याम निभाए ठाठ, कहा जग माया संभ्रम |
जीवन राह में मिलें हज़ारों आकर्षण-भ्रम |
यही श्याम की सीख, योग है यही कृष्ण का |
जल, जल-जीव व पंक मध्य, नर रहे कमल सा ||

Saturday, September 17, 2011

कभी न छोटा समझें ......डा श्याम गुप्त

   (एक षट्पदी अगीत )

दुश्मन को पद-दलित धूलि को,
अग्नि,पाप, ईश्वर व सर्प को;
कभी न छोटा करके समझें |
इनके बल, गुण, कर्म भाव का,
नहीं  कभी  भी   अहंकार वश;
करें   उपेक्षा,    असावधानी ||

Friday, September 16, 2011

फ़िरक़ापरस्त

करते नहीं हैं फ़िरक़ापरस्ती का कुछ इलाज
अब फर्ज़ ए मंसबी से भी ग़ाफिल हैं हुक्मरां
देते नहीं ईंट का पत्थर से ये जवाब
फ़िरक़ापरस्त शेर हैं बुज़दिल हैं हुक्मरां


मतीन अमरोही

Tuesday, September 13, 2011

दाता तेरे हज़ारों हैं नाम - रज़िया "राज़"





दाता तेरे हज़ारों हैं नाम…(2)
कोई पुकारे तुझे रहीम,
और कोई कहे तुझको राम।दाता(2)
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पेहरा,
तेरा राज़ बड़ा ही गैहरा,
तेरे इशारे होता सवेरा,
तेरे इशारे होती शाम।दाता(2)
ऑंधी में तुं दीप जलाए,
पत्थर से पानी तूं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तू बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।दाता(2)
क़ुदरत के हर-सु में बसा तू,
पत्तों में पौंधों में बसा तू,
नदिया और सागर में बसा तू,,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तू,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।दाता(2)
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सूरज और ये तारे,
पतझड़ हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देखूँ मैं ले के तेरा नाम।दाता(2) 
Source :  http://www.thenetpress.com/2009/08/blog-post_08.html

Monday, September 12, 2011

यदि तुम आजाते जीवन में ( महादेवी जी की पुण्य-तिथि पर.)...----डा श्याम गुप्त




.                                महीयसी  महादेवी  वर्मा जी की पुण्यतिथि पर .....उन्हीं की भाव-भूमि पर ...एक श्रृद्धा सुमन ...

यदि तुम आजाते जीवन में ,
निश्वासों में बस कर मन में |
कितने सौरभ कण से हे प्रिय!
बिखरा जाते इस जीवन में |

गाते रहते मधुरिम पल-छिन,
तेरे  ही गीतों का  विहान  |
जाने कितने वे इन्द्रधनुष,
खिल उठते नभ में बन वितान |

             खिल उठतीं कलियाँ उपवन में|
             यदि  तुम आजाते  जीवन में ||

महका  महका आता सावन,
लहरा लहरा  गाता सावन |
तन मन पींगें भरता नभ में ,
नयनों मद भर लाता सावन |

जाने  कितने  वर्षा-वसंत,
आते जाते पुष्पित होकर |
पुलकित होजाता जीवन का,
कोना कोना सुरभित होकर |

              उल्लास समाता कण कण में ,
              यदि तुम आजाते जीवन में ||

संसृति भर के सन्दर्भ सभी ,
प्राणों  की  भाषा बन् जाते |
जाने कितने नव-समीकरण,
जीवन  की  परिभाषा गाते |

पथ में  जाने  कितने दीपक,
जल उठते बनकर दीप-राग |
चलते हम तुम मन मीत बने,


बज उठते नव संगीत साज |

                 जलता राधा का प्रणय-दीप ,
                 तेरे मन के  वृन्दाबन में   |
                 यदि तुम आजाते जीवन में ||

इश्क़ की ताक़त

इश्क़ की एक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम
इस ज़मीनो आसमाँ को बेकराँ समझा था मैं

जो उर्दू नहीं जानते उनके लिए :-
जस्त यानि छलाँग , बेकराँ यानि अनंत
यह शेर बताता है कि जिन चीज़ों की इंतेहा समझना अक़्ल के बस से बाहर है , अपने रब से इश्क़ की बदौलत उनसे भी आगे देख सकता है ।

Saturday, September 10, 2011

                      कविता क्यों .....एक... श्याम सवैया  छंद ..

कविता क्यों भला करता है कवि, यूं जाग जाग कर रातों को |
कहता वह जीवन के अनुभव अपने मन की मधु यादों को |
जीवन के सत्य व शास्त्र सत्य,मानव व्यवहार की बातों को |
रखता जन मन के सम्मुख वह कुछ यथा तथ्य संवादों को |
सब जन हिताय, बहु जन हिताय लोकाचारी अनुनादों को |
हो राष्ट्र समाज देश उन्नत ,इस सोच में जागता रातों को ||

Monday, September 5, 2011

राधाष्टमी पर...ड़ा श्याम गुप्त के दो पद ......


जनम लियो वृषभानु लली ।
आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली।
जलज-चक्र,रवि तनया विलसति,सुलसति लसति भली ।
पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली।
पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली ।
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली ।
नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली ।
बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली ।।

--
कन्हैया उझकि-उझकि निरखै
स्वर्ण खचित पलना,चित चितवत,केहि विधि प्रिय दरसै
जंह पौढ़ी वृषभानु लली , प्रभु दरसन कौं तरसै
पलक -पाँवरे मुंदे सखी के , नैन -कमल थरकैं
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों ,फर फर फर फरकै
तीन लोक दरसन को तरसे, सो दरसन तरसै
ये तो नैना बंद किये क्यों , कान्हा बैननि परखै
अचरज एक भयो ताही छिन , बरसानौ सरसै
खोली दिए दृग , भानु-लली , मिलि नैन -नैन हरसें
दृष्टि हीन माया ,लखि दृष्टा , दृष्टि खोलि निरखै
बिनु दृष्टा के दर्श ' श्याम' कब जगत दीठि बरसै

Friday, September 2, 2011

त्रिपदा अगीत......ड़ा श्याम गुप्त.....

चाहत थी हम कहें बहुत कुछ ,
तुम हर लम्हा रहे लजाते;
हम  कसमसाते ही रह गए |

आगये खाली हाथ दर पे ,
पूछा क्या लाये तो बोले;
दिल दूसरा कहाँ से लाएं |

कहके  वफ़ा करेंगे सदा ,
वो  जफा करने लगे यारो;
ये कैसा सिला है बहारो  |

बात क्या बागे-बहारों की,
बात न हो चाँद सितारों की;
बात बस तेरे इशारों की |

प्रीति प्यार में नया नहीं कुछ ,
वही पुराना किस्सा यारो;
लगता शाश्वत नया नया सा ||

Wednesday, August 31, 2011

मेरी आँखों से कोई उन्हें देख ले

कोई उन्हें देख ले
मेरी मोहब्बत को
पहचान ले
निरंतर दिल में
उठ रहे
जलजले को जान ले
मेरा पैगाम उन तक
पहुंचा दे
हाल-ऐ-दिल उन्हें
बता दे
मुझे मंजिल तक
पहुंचा दे 
31-08-2011
1424-146-08-11

Tuesday, August 30, 2011

-कौन है वो...ड़ा श्याम गुप्त....

 कौन है वो  जो हरेक पल की आरज़ू बनकर |
 दिल के इन बंद दरीचों में समाये जाता |

किस के दामन की हवा का ये महकता झोंका ,
गमे-दरिया को भी इस दिल के बहाए जाता |

किसने यह छेड़ दिया राग बसन्ती आकर ,
झूमने गाने लगा दिल था जो गम से बोझिल |

किसकी वीणा की मधुर तान ने सरगम छेड़ी,
याद आने लगे  तन्हाई  में,  बीते  वो   पल |

हो चला झंकृत तन-मन का ये कोना कोना ,
बस गया कौन है ये नाद-अनाहत बनकर |

ये फिजाँ झूम के मचली तो हम ये जान गए,
तू ही इस राह से गुजरा है जुस्तजू बनकर  ||

Sunday, August 28, 2011

सच्चे मददगार

आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.

मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.

बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.

अपनों का साथ देने को आरास्ता हर पल,
ले आते आलमे-फरेफ्तगी ये मददगार.

आंसू की एहसानमंद है तबसे ''शालिनी''
जब से हैं मय्यसर उसे कमज़र्फ मददगार.


कुछ शब्द-अर्थ:
उमरे-रफ्ता--गुज़रती हुई जिंदगी,
जरखेज़-कीमती,
मादूम-नष्ट-समाप्त,
आलमे-फरेफ्तगी--दीवानगी का आलम.

शालिनी कौशिक


Friday, August 26, 2011

एक उस्ताद शायर हैं मिर्जा दाग़ दहलवी का संक्षिप्त परिचय

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद शैख़, ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़स में पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर 100 रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’ ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुनके कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शैख़’ ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई
यूँ अपने ज़माने में एक-से-एक बढ़कर उस्ताद एवं ख्याति-प्राप्त शाइर हुए, मगर जो ख्याति और शुहरत अपनी ज़िन्दगीमें ‘दाग़’ को मिली, वह औरों को मयस्सर नहीं हुई। भले ही आज उनकी शाइरी का ज़माना लद गया है और मीर, दर्द, आतिश, ग़लिब, मोमिन, ज़ौक़, आज भी पूरे आबो-ताबके साथ चमक रहे हैं। लेकिन अपने ही जीवनकाल में उन्हें ‘दाग़’-जैसी ख्याति प्राप्त नहीं हो सकी।

जनसाधराण के वे महबूब शायर थे। उनके सामने मुशाअरो में किसी का भी रंग नहीं जमने पाता था। हजरत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -‘‘मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने जिक्र किया कि नवाब कल्बअली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहब का शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरों को जाते थे।

‘‘एक बार मुंशी ‘मुनीर’ शिकोहाबादीने सरे-दरबार हजरत ‘दाग़’ का दामन थामकर कहा कि-‘क्या तुम्हारे शेर लोगों की ज़वानों पर रह जाते हैं और मेरे शेरों पर लोंगों की न ख़ास तवज्जह होती है, न कोई याद रखता है।’ इसपर जनाब ‘अमीर मीनाई’ ने फ़र्माया- ‘‘यह खुदादाद मक़बूलियत है, इसपर किसी का बस नहीं।’’

यह मशूहूर है कि दाग़ की ग़ज़ल के बाद मुशआर के किसी शाइर का शेर विर्दे-जबा़न न होता था। ‘असीर’ (अमीर मीनाई के उस्ताद) का मक़ूला है कि वह कलाम पसन्दीदा है, जो मुशाअरे से बाहर जाये। फ़र्माते थे कि मैंने बाहर जाने वालों में अक्सर मिर्जा ‘दाग़’ का शेर बाहर निकलते देखा है।

हज़रत मुहम्मदअली खाँ ‘असर’ रामपुरी लिखते हैं-‘‘जब ‘दाग़’ मुशाअरे में अपनी ग़ज़ल सुनाते थे, तो रामपुर के पठान उन्हें सैकड़ों गालियाँ देते थे। दारियाफ़्त किया गया कि गालियों का क्या मौका था। पता चला कि कलाम की तासीर (असर) और हुस्ने-कुबून (पसन्दीदगी) का यह आलम था कि पठान बेसाख्ता चीख़ें मार-मार कर कहते थे कि-‘उफ़ ज़ालिम मार डाला।’ ओफ़्फोह ! गला हलाल कर दिया। उफ़-उफ़ सितम कर दिया, ग़ज़ब ढा दिया।

एक दिन नवाब खुल्द-आशियाँने नवाब अब्दुलखाँ से पूछा कि ‘दाग़’ के मुतअल्लिक़ तुम्हारी क्या राय है। जवाब दिया कि -‘‘तीतड़े में गुलाब भरा हुआ है।’’ मक्सद यह है कि सूरत तो काली है, लेकिन बातिन (अंतरंग) गुलहार-मआनीकी खुशबुओ (कविता-कुसुम की सुगन्धों) से महक रहा है।



जब उनकी ग़ज़ले थिरकती थीं। यहाँ तक कि उनकी ख्यातिसे प्रभवित होकर उनके कितने समकालीन शाइर अपना रंग छोड़कर रंगे-दाग़ में ग़ज़ल कहने लगे थे। दाग़ की ख्याति और लोक-प्रियता का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्त में ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था और उन दिनों क्यों, आज भी ऐसे शाइर मौजूद हैं, जिन्हें ब-मुश्किल एक-दो ग़ज़लों पर इस्लाह लेना नशीब होगा, फिर भी बड़े फ़ख़्र के साथ अपनेको मिर्जा ‘दाग़’ का शिष्य कहते हैं।
साभार : http://podcast.hindyugm.com/2008/10/mirza-daag-dehalvi-and-his-kalaam.html 

शिशिर पारखी की आवाज़ में मिर्जा दाग़ दहलवी की ग़ज़ल

Thursday, August 25, 2011

कुछ कलाम पानीपत के मुशायरे से

पानीपत । जामिया दारूल उलूम ट्रस्ट हाली कॉलोनी की में शायर ताहिर सदनपुरी की तरफ़ से टी. वी. कलाकार राजेन्द्र गुप्ता के सम्मान में एक मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें ख़ास तौर पर ये शेर ज़्यादा पसंद किए गए ।
फ़लक के चांद को मुश्किल में डाल रखा है
ये किसने खिड़की से चेहरा निकाल रखा है
शायर - इक़बाल अहमद ‘इक़बाल‘

तूने जब ख़त्म ही कर डाले हैं रिश्ते सारे
फिर ये सावन तेरी आंखों से बरसता क्यूं है
शायर - महबूब अली ‘महबूब‘

सीने से दिल निकाल कर क़दमों पे रख दिया
वो कैसे मेरे प्यार से इन्कार करेंगे
शायर - शकील सीतापुरी

वतन के हुक्मरानो , ग़लतफ़हमी में मत रहना
ये बूढ़ी हड्डियां इस मुल्क का चेहरा बदल देंगी
शायर - पंडित शिवकांत ‘विमल‘

कुछ कलाम पानीपत के मुशायरे से

Wednesday, August 24, 2011

कृष्ण जन्म ......पद...ड़ा श्याम गुप्त ...




बृज की भूमि भई है निहाल |
आनंद-कंद प्रकट भये बृज में,विरज भये बृज ग्वाल |
 सुर गन्धर्व अपछरा गावंहि, नाचहिं  दै दै ताल |
आशिस देंय विष्णु ब्रह्मा शिव, मुसुकावैं गोपाल |
 जसुमति द्वारे बजै बधायो,  ढफ ढपली खड़ताल |
पुरजन परिजन हरख मनावें, जनमु लियो नंदलाल |
बाजहिं, ढोल, मृदंग ,मंजीरा,  नाचहिं  बृज के बाल | 
सुर दुरलभ छवि निरखि-निरखि छकि श्याम' भये हैं निहाल ||

Monday, August 22, 2011

रमज़ान की विदाई -डा. फ़ितरतुल्लाह अंसारी ‘फ़ितरत‘

हरेक मोमिन को आज ‘फ़ितरत‘ ख़याले फ़ुरक़त सता रहा है
बदल रहा है निज़ामे आलम के माहे रमज़ान जा रहा है

अजीब माहौल है जहां का उदासियां ही उदासियां हैं
ज़मीं की हालत भी है दीगर गूं फ़लक भी आंसू बहा रहा है

ज़रा तो छोड़ो ये ख्वाबे ग़फ़लत के वक्त कुछ भी नहीं है बाक़ी
कहां मयस्सर ये होगा तुम को क़ुरआं जो हाफ़िज़ सुना रहा है

ख़ुदा की रहमत बरस रही है खुला हुआ है दरे इजाबत
जो सो रहा है वो खो रहा है जो जागता है वो पा रहा है

ख़ुदा पे ईमान रखने वालों ख़ुदा का फ़रमान ये भी सुन लो
उसी को जन्नत मिलेगी इक दिन जो दिल से महवे दुआ रहा है

फ़िज़ा ए अफ़्तार में सहर में हर एक ज़र्रे में बहर ओ बर्र में
है चश्मे बीना तो देख लो तुम वो अपना जलवा दिखा रहा है

ना तुम रहोगे ना मैं रहूंगा न रह सकेगी जहां की रौनक़
ये अलविदा का पयाम ‘फ़ितरत‘ ये चश्म पुर नम सुना रहा है

डा. फ़ितरतुल्लाह अंसारी ‘फ़ितरत‘

Sunday, August 21, 2011

जन्माष्टमी पर एक पद...... ड़ा श्याम गुप्त ..


कैसी लीला रची गुपाल |
लूटि लूटि दधि-माखन खावें छकि हरखें ब्रिज-बाल |
क्यों हमको दधि-माखन वर्जित मथुरा नगर पठावें |
धन-संपदा ग्राम की घर की , नंदलाल समुझावें |
नीति बनाओ , दधि-माखन जो मथुरा लेकर जाय |
फोरि  गगरिया लूटि लेउ सब नगर न पहुंचन पाय |
हम बनिहें बलवान-संगठित , रक्षित सब घर-द्वार |
श्याम' होयँ संपन्न सुखी सब ,सहें न अत्याचार ||